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ફિરાક ગોરખપુરી 3 માર્ચ

Written By Kamlesh Zapadiya on શનિવાર, 3 માર્ચ, 2012 | 5:44:00 AM

શ્રી એલ.વી.જોષી
ઊર્દૂ ગઝલના સદાબહાર કવિ ફિરાક ગોરખપુરીનો જન્મ ઇ.સ.1896 માં
ઉત્તરપ્રદેશના ગોરખપુરમાં થયો હતો.એમનું મૂળ નામ રઘુવીર સહાય. ‘ફિરાક’ તો
એમનું તખલ્લુસ હતું. ઉર્દૂનો અભ્યાસ તો પિતાએ જ કરાવ્યો. બી.એ.થઇ
કાનપુરમાં વ્યાખ્યાતા તરીકે જોડાયા,દરમિયાન ડેપ્યુટી કલેકટર તરીકે તેમની
વરણી થઇ પણ ગાંધીજીના પ્રભાવ હેઠળ એમણે એ તક જતી કરીને અસહકારની લડતમાં
ઝંપલાવ્યું. ‘સોલા ઇ સાજ’ , ‘ઘર કી કરવટ’ , ‘ગઝલિસ્તાન’ , ‘ચરાગા’ વગેરે
એમના પ્રકાશનો છે. ભારત સરકારે ‘પદ્મભૂષણ’ નું સન્માન પણ આપ્યું. એમની
ગઝલોમાં આકૃતિનું સૌષ્ઠવ અને વિચારોની શક્તિ પ્રગટ થાય છે. ‘બજમે જિંદગી’
, ‘રંગે શાયરી’ એમના મુખ્ય કાવ્યસંગ્રહમાં તેમની કવિતાનું હીર આવી જાય
છે. હવાઇ ઉડયનોમાં રાચતી ગઝલને એમણે વાસ્તવિકતાની ભૂમિ પર ઉતારીને તેની
પ્રતિષ્ઠા કરી છે. દિલ્હીમાં 3/3/1982 ના રોજ એમનું દેહાવસાન થતા આધુનિક
યુગના શ્રેષ્ઠ ઉર્દૂ કવિની એક મોટી ખોટ પડી. એમના ‘ગુલઇ નગ્મા’
કાવ્યસંગ્રહને લક્ષમાં રાખી ભારતીય જ્ઞાનપીઠે પારિતોષિક આપેલું.
ઉત્તરપ્રદેશની રાજય સરકારે અને કેન્દ્રીય સાહિત્ય અકાદમીના પણ તેમને
પુરસ્કારો મળેલા. એમણે છેલ્લે કહ્યું હતું :

“ અબ તુમસે રૂખસદ
લેતા હું આઓ, સંભાલો સાજે ગઝલ,
  નયે તરાને છેડો,
મેરે નગ્મો કો નીંદ આતી હૈ.”

2 comments:

  1. फ़िराक़ गोरखपुरी / परिचय
    फ़िराक़ गोरखपुरी

    जन्म

    28 अगस्त 1896
    निधन: 1982


    उपनाम फ़िराक़ फिराक गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय) (२८ अगस्त १८९६ - ३ मार्च १९८२) उर्दू भाषा के प्रसिद्ध रचनाकार है। उनका जन्म गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में कायस्थ परिवार में हुआ। इनका मूल नाम रघुपति सहाय था। रामकृष्ण की कहानियों से शुरुआत के बाद की शिक्षा अरबी, फारसी और अंग्रेजी में हुई।

    विवाह

    २९ जून, १९१४ को उनका विवाह प्रसिद्ध जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। कला स्नातक में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान पाने के बाद आई.सी.एस. में चुने गये। १९२० में नौकरी छोड़ दी तथा स्वराज्य आंदोलन में कूद पड़े तथा डेढ़ वर्ष की जेल की सजा भी काटी। ।

    आंदोलन

    जेल से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ्तर में अवर सचिव की जगह दिला दी। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद अवर सचिव का पद छोड़ दिया। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में १९३० से लेकर १९५९ तक अंग्रेजी के अध्यापक रहे।

    फिराक जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहे।
    साहित्य अकादमी सदस्य आधिकारिक सूची
    शायरी

    फिराक गोरखपुरी की शायरी में गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूहे-कायनात, नग्म-ए-साज, गजालिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज व कायनात, चिरागां, शोअला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधीरात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना फिराक साहब ने की है। उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियाँ भी लिखी हैं। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुई हैं।

    साहित्यिक जीवन

    फिराक ने अपने साहित्यिक जीवन का श्रीगणेश गजल से किया था। अपने साहित्यिक जीवन में आरंभिक समय में ६ दिसंबर, १९२६ को ब्रिटिश सरकार के राजनैतिक बंदी बनाए गए। उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। नज़ीर अकबराबादी , इल्ताफ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फिराक गोरखपुरी का भी है। फिराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है। दैनिक जीवन के कड़वे सच और आने वाले कल के प्रति उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फिराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। फारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई है।

    कृतियाँ

    गुले-नग़मा, बज्में जिन्दगी रंगे-शायरी, सरगम

    पुरस्कार

    उन्हें गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार

    ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किया गया।

    उन्हें गुले-नग़मा के लिये 1969 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

    फिराक गोरखपुरी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन १९६८ में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

    संपादन

    १९७० में उनकी उर्दू काव्यकृति ‘गुले नग्‍़मा’ पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।

    अनुवाद

    बाद में १९७० में इन्हें साहित्य अकादमी का सदस्य भी मनोनीत कर लिया गया था।

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